सोमवार, 11 जुलाई 2016

शाहजहांपुर में पहली क्रांति

                                                    शाहजहांपुर में पहली क्रांति
                           
                                       अंग्रेजों की हड़प  नीति  और अन्य  अनीतियों के चलते जहां इसके शिकार राजे रजवाड़े उद्वेलित थे वहीं  जनता में  भी आक्रोश व्याप्त था । रक्त कमल और रोटी घर घर  घूम चुकी थी । लोग रोटी हाथ में लेकर अंग्रेजों के  खिलाफ लड़ने की कसमें खा चुके थे। पूरा उत्तर भारत विद्रोह की दहकती भट्टी बना  हुआ था । सभी को इंतज़ार था ३१ मई १८५७ का । 
                                     शाहजहांपुर  इस देशव्यापी हलचल से अछूता  नहीं था । कमल और रोटी यहां भी गाँव गाँव घूम चुके थे। अचानक दस मई १८५७ को मेरठ में मंगल पांडे ने समय से पूर्व ही विद्रोह का बिगुल फूंक दिया । इससे मुरादाबाद बरेली बदायूं और शाहजहांपुर की पलटनों में भी बेचैनी फ़ैल गई लेकिन क्रान्ति के बड़े नेताओं ने स्थिति को सम्भाल लिया । फिर भी मेरठ और दिल्ली की ख़बरें  छन छन कर शाहजहांपुर  आ रहीं थीं  और जनता में सनसनी घोल रही थीं ।  इधर जनता भावी महासमर के लिए कमर कसने लगी थी उधर अंग्रेज भयभीत थे । रामसे म्यूर  ए शार्ट हिस्ट्री आफ डी ब्रिटिश कॉमनवेल्थ में लिखते हैं की अंग्रेजों को शर के लोगों से विद्रोह कर बैठने का भय था । 







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