शाहजहांपुर में पहली क्रांति
अंग्रेजों की हड़प नीति और अन्य अनीतियों के चलते जहां इसके शिकार राजे रजवाड़े उद्वेलित थे वहीं जनता में भी आक्रोश व्याप्त था । रक्त कमल और रोटी घर घर घूम चुकी थी । लोग रोटी हाथ में लेकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने की कसमें खा चुके थे। पूरा उत्तर भारत विद्रोह की दहकती भट्टी बना हुआ था । सभी को इंतज़ार था ३१ मई १८५७ का ।
शाहजहांपुर इस देशव्यापी हलचल से अछूता नहीं था । कमल और रोटी यहां भी गाँव गाँव घूम चुके थे। अचानक दस मई १८५७ को मेरठ में मंगल पांडे ने समय से पूर्व ही विद्रोह का बिगुल फूंक दिया । इससे मुरादाबाद बरेली बदायूं और शाहजहांपुर की पलटनों में भी बेचैनी फ़ैल गई लेकिन क्रान्ति के बड़े नेताओं ने स्थिति को सम्भाल लिया । फिर भी मेरठ और दिल्ली की ख़बरें छन छन कर शाहजहांपुर आ रहीं थीं और जनता में सनसनी घोल रही थीं । इधर जनता भावी महासमर के लिए कमर कसने लगी थी उधर अंग्रेज भयभीत थे । रामसे म्यूर ए शार्ट हिस्ट्री आफ डी ब्रिटिश कॉमनवेल्थ में लिखते हैं की अंग्रेजों को शर के लोगों से विद्रोह कर बैठने का भय था ।
